वैशाख चौथ व्रत कथा (Vaishakh Chauth Ki Kahani )

श्री चौथ माता व्रत की विधि

पूजन विधि – चौथ माता के व्रत के लिए साधक दिन भर भूखा रहे। एक पाटे पर चौथ-गणेश की मूर्ति या फोटो रख दे। यदि फोटो या मूर्ति न हो तो साटिया (स्वास्तिक) मांड दे और पास ही आखा ( गेहूं, चावल ) रखकर ऊपर जल का कलश रख दे एवं घी का दीपक जलावे। एक थाल में प्रसाद, गुड़, खोपरा, मेहन्दी, लच्छा, धूप, सिंदूर, रोली, चावल रख देवे। पूजा करते समय अगरबत्ती जला देवे, चौथ-विनायक की मूर्ति एवं जल के कलश पर रोली से तिलक करके चावल लगा देवे। हाथों में मेहन्दी लगाकर लच्छा बांध लेवे, फिर बैसन्दर पर धूप, प्रसाद एवं घी खेवे फिर चौथ की कहानी पढ़े या सुनकर माताजी की आरती करे। चन्द्रमा उदय होने पर थाली में प्रसाद, अगरबत्ती व जल का कलश ऐसे स्थान पर ले जाए जहां से चन्द्रमा के दर्शन अच्छी तरह होवें, प्रसाद का भोग लगाकर जल चढ़ावे, अगरबत्ती जला देवे और 5 परिक्रमा देवे। फिर प्रसाद खाकर भोजन कर लेवे। बड़ी चौथ को बहुत से भक्त दिन भर खड़े रहकर ऊबी चौथ व्रत करते हैं और चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही बैठते हैं।

|| वैशाख- चौथ की कहानी ||

इस बार 19 अप्रैल 2022, दिन गुरुवार को वैशाख महीने में संकष्टी चतुर्थी या वैशाख चौथ (Vaishakh Chaturthi) व्रत किया जाएगा। इस व्रत में भगवान श्री गणेश और चौथ माता की पूजा होती है। इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति और संतान की कोई चिंता है तो वह दूर करने वाली यह चतुर्थी मानी गई है। इस व्रत की कथा इस प्रकार है

एक साहूकार के एक बेटा-बहू थे। बहू पीहर जाती तब उसके पिता पूछते कि क्या खाकर आई है। बेटी बोलती, पिताजी बासी-सूखी खाकर आई हूँ। एक दिन साहूकार का बेटा अपने ससुर से मिलने गया तो ससुर ने पूछा, बेटा, मेरी बेटी को बासी-सूखी क्यों देते हो। उसने जाकर अपनी माँ को कहा। माँ बोली, मैं तो उसको गर्म खाना देती हूँ, तू कल ही देख लेना। उसने देखा तो वह गर्म ही खा रही थी। एक दिन फिर उसके पिता ने पूछा, बेटी क्या खाकर आई है। बेटी बोली, पिताजी सूखी-बासी खाकर आई हूँ तो उसका पति बोला, तू झूठ क्यों बोलती है, जब वह बोली ना तुम कमाते हो, ना आपके पिताजी कमाते हैं तो वह बासी-सूखी ही तो हुई। ये सुनकर उसका पति कमाने के लिए निकल गया। उसने इतना धन कमाया कि वह वहीं रहने लग गया। एक दिन साहूकार की बहू पड़ोसन से आग लेने गई तो सब औरतें चौथ माता की कहानी सुनी रही थीं।

वो बोली, आप सब ये क्या कर रही हों। तब वे बोलीं, हम चौथ माता की कहानी सुन रहे हैं। इसके सुनने से अन्न-धन होता है। बेटे-पोते होते हैं, बारह वर्ष से बिछुड़ा पति घर लौट आता है। उस दिन से वह भी चौथ व्रत करने लग गई। सासू चार समय खाना देती, उसमें से एक समय का ब्राह्मण को दे देती। एक समय का गड्ढे में गाड़ देती, एक समय का चांद को अरक देकर खुद खा लेती। ऐसे ही चौथ का व्रत करते बारह वर्ष हो गए। चौथ विन्दायक ने सोची कि इसको व्रत करते बारह वर्ष हो गए अगर इसके पति को वापस नहीं लाए तो कलयुग में अपने को कौन मानेगा।

इसलिए उस रात ही चौथ माता | उसके पति को बोली कि अब तू घर चला जा तेरी पत्नी तुझे याद कर रही है। तब वो बोला, मैं तो काम में बहुत उलझ गया हूं, अब तो जाना मुश्किल है। तब चौथ माता बोली कि दिन उगने से पहले ही दोनों गोड़े गाड़ कर चौथ माता का नाम लेकर बैठ जाना, देने वाले दे जाएंगे और लेने वाले ले जाएंगे। उसने वैसा ही किया। देने वाले दे गए, और लेने वाले ले गए। घर आने लगा तो एक बूढ़ा साँप दुखी हो कर जलने के लिए जा रहा था। उसने उसे छिछकार दिया। साँप बोला, तूने मुझे क्यों छिछकारा अब मैं तुझे खाऊँगा। वो बोला, खा लेना। तू मुझे मेरी माँ से मिल आने दे फिर खा लेना।

साँप बोला कि कैसे विश्वास करूँ तू तो छत पर जाकर सो जाएगा। वो बोला, सीढ़ियाँ चढ़कर आ जाना। इतना कहकर लड़का उदास होकर घर आया और किसी से कुछ भी नहीं बोला और छत पर सो गया। उसकी पत्नी ने एक सीढ़ी पर बालू, दूसरी पर दूध का प्याला, तीसरी पर फूल व चौथी पर चौथ माता के आखे रख दिए। रात में साँप आया। पहले तो बालू में खूब लोट-पलोट खा लिया, फिर दूध पी लिया, फिर फूलों की खूब खुशबू ले ली। चौथ माता सोची कि मैं इसका संकट नहीं टालूँगी तो अपने को कौन मानेगा सो आखों के झट से ढाल तलवार बन गए। सांप की पूछ कटकर उसकी जूती में गिर गई तो सांप की पूँछ सोची कि इसे चटका तो दिखाऊगी।

जब चींटियों ने आपस में बात करी कि इसकी पत्नी अपने को आटा खिलाती थी इसलिए इसके पति की रक्षा करनी चाहिए, इसलिए सारी चीटियों ने पूंछ को थोथी कर दिया और संकट टल गया। लड़के को सुबह उठने में देर हो गई तो माँ उसे उठाणे जाने लगी तो सीढ़ियों में खून देखकर वो चिल्लाई कि मेरा बेटा मर गया। ऊपर जाकर देखा तो बेटा सो रहा था। बेटे ने आकर पूछा कि मेरे लिए कोई धर्म-पुण्य करती थी क्या, तो माँ बोली मैं तो नहीं करती थी। जब उसने अपनी पत्नी से पूछा तो वो बोली, मैंने किया था। मैं बारह महीनों की चारों चौथ करती थी।
सासू बोली, पर मैं तो तुझे चारों समय खाना देती थी। बहू बोली, मैं एक समय का ब्राह्मण को देती थी, उसने हां कर दी, एक समय का गाय को देती थी, वह हां भर दियो, एक समय का गढ्डे में गाड़ देती थी। जब खोदकर देखा, तो सोने की रोटियों को ढेर लग रहा था। एक समय का अरख देकर खा लेती थी। सारी नगरी में कहलवा दिया कि पुरूष की लुगाई, बेटा की माँ, दीदागोड़ा की धीराणी सब ही चौथ माता का व्रत करे। हे चौथ माता ! जैसे उसको सुहाग दिया वैसा सबको देना, कहानी के कहने वाले, सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले अड़ोसन-पड़ोसन सबको देना ।

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